LPG सिलेंडर की साजिश: महासमुंद में 1.5 करोड़ का गैस घोटाला, अफसर से एजेंसी संचालक तक—सब एक ही जाल में, बीजेपी नेता गिरफ्तार
LPG cylinder conspiracy: 1.5 crore gas scam in Mahasamund, from officer to agency operator—all in the same trap, BJP leader arrested
महासमुंद : जहां रसोई गैस आम आदमी की जरूरत और जीवन की अनिवार्य धड़कन मानी जाती है. वहीं उसी गैस को लेकर महासमुंद जिले में ऐसा सनसनीखेज घोटाला सामने आया है. जिसने पूरे प्रशासनिक ढांचे को कटघरे में खड़ा कर दिया है. करीब 1.5 करोड़ रुपये की रसोई गैस की हेराफेरी का यह मामला अब सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि विश्वासघात की एक भयावह कहानी बन चुका है.
इस पूरे घोटाले में खाद्य विभाग के दो जिम्मेदार अधिकारी और एक गैस एजेंसी संचालक की गिरफ्तारी ने यह साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार किस तरह व्यवस्था के भीतर ही जड़ें जमा चुका है. पुलिस ने अजय यादव (खाद्य अधिकारी), मनीष यादव (सहायक खाद्य अधिकारी) और पंकज चंद्राकर (एजेंसी संचालक) जो भाजपा के पूर्व राज्यमंत्री पूनम चंद्राकर के दामाद है को गिरफ्तार कर लिया है. वहीं, इस काले खेल के अन्य किरदार संतोष ठाकुर और सार्थक ठाकुर अब भी फरार हैं. जिनकी तलाश में पुलिस की टीमें लगातार दबिश दे रही हैं.
आरोप है कि खाद्य अधिकारी अजय यादव, सहायक खाद्य अधिकारी मनीष यादव और गौरव गैस एजेंसी के संचालक पंकज चंद्राकर ने प्लांट मैनेजर निखिल वैष्णव के साथ मिलीभगत कर प्लानिंग के साथ 6 गैस कैप्सूल को अभनपुर स्थित ठाकुर पेट्रोकेमिकल को हैण्ड ओवर किया था. जहां से कैप्सूल वाहनों में भरी गैस को धीरे-धीरे निकालकर अलग-अलग टैंकरों के जरिए बाजार में खपा दिया.
GPS ट्रैकिंग से खुली परतें!
जांच के दौरान कैप्सूल वाहनों में लगे जीपीएस सिस्टम से मिली जानकारी ने पूरे घोटाले का पर्दाफाश कर दिया. जिसमें सामने आया कि 31 मार्च को 2 कैप्सूल, 1 अप्रैल को 1 कैप्सूल, 3 अप्रैल को 1 कैप्सूल और 5 अप्रैल को 2 कैप्सूल से गैस निकाली गई. इस तरह कुल 6 कैप्सूल से 90 मीट्रिक टन अवैध रूप से गैस खाली की गई.
रिकॉर्ड में भारी गड़बड़ी!
जब्त दस्तावेजों की जांच में भी गंभीर अनियमितताएं सामने आईं. रिकॉर्ड के मुताबिक, अप्रैल महीने में सिर्फ 47 टन गैस खरीदी गई थी. और शुरुआती स्टॉक भी शून्य था. इसके बावजूद 107 टन से ज्यादा गैस की बिक्री दर्ज दिखाई गई. खरीद और बिक्री के आंकड़ों में यह भारी अंतर साफ तौर पर चोरी और कालाबाज़ारी की तरफ इशारा करता है.
कर्मचारियों के बयान से खुलासा!
प्लांट में काम करने वाले कर्मचारियों ने पूछताछ में कबुल किया कि उन्होंने यह काम उच्च अधिकारियों के निर्देश पर किया. गैस को पहले प्लांट के बुलेट टैंक में खाली किया जाता था और फिर निजी टैंकरों के जरिए अलग-अलग स्थानों पर भेज दिया जाता था. जांच में यह भी सामने आया है कि रायपुर और आसपास के इलाकों में 4 से 6 टन तक गैस की सप्लाई कच्चे चालान के जरिए की गई.
चार हिरासत में, दो फरार!
मामले में प्लांट मैनेजर निखिल वैष्णव, खाद्य अधिकारी अजय यादव, सहायक खाद्य अधिकारी मनीष यादव के अलावा गौरव गैस एजेंसी के संचालक पंकज चंद्राकर को हिरासत में लिया है. वहीं ठाकुर पेट्रोकेमिकल के मालिक संतोष ठाकुर और सार्थक ठाकुर फरार हैं.
“प्लानिंग के साथ खेला गया 1.5 करोड़ का दांव”
पुलिस जांच में जो खुलासे हुए. वे किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं हैं। सामने आया कि यह कोई छोटा-मोटा घोटाला नहीं, बल्कि पूरी योजना के साथ रचा गया एक बड़ा षड्यंत्र था.
खाद्य अधिकारी अजय यादव, सहायक खाद्य अधिकारी मनीष यादव और एजेंसी संचालक पंकज चंद्राकर ने मिलकर 6 गैस कैप्सूल (टैंकर) को सीधे अभनपुर स्थित ठाकुर पेट्रोकेमिकल को “हैंडओवर” कर दिया.
इन कैप्सूल में भरी गैस की बाजार कीमत करीब 1.5 करोड़ रुपये से ज्यादा आंकी जा रही है. यह गैस सरकारी सिस्टम से हटाकर निजी मुनाफे के लिए बेची जा रही थी—यानी आम जनता के हक पर सीधा डाका..
“मुख्य आरोपी फरार—पुलिस की टीमें अलर्ट”
इस पूरे खेल में ठाकुर पेट्रोकेमिकल की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है. पुलिस को पुख्ता सबूत मिले हैं कि फर्म के संचालक संतोष ठाकुर और सार्थक ठाकुर इस अवैध कारोबार के प्रमुख हिस्सेदार थे. लेकिन जैसे ही पुलिस ने शिकंजा कसना शुरू किया, दोनों आरोपी फरार हो गए. अब पुलिस की कई टीमें संभावित ठिकानों पर लगातार छापेमारी कर रही हैं.
सूत्रों की मानें तो इन आरोपियों के पकड़ में आने के बाद इस घोटाले से जुड़े और भी बड़े नाम सामने आ सकते हैं.
“कलेक्टर के आदेश बने सवालों के घेरे में”
इस पूरे मामले में एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है—जिला कलेक्टर द्वारा गैस कैप्सूल को प्लांट में रखने की अनुमति.. अब यह आदेश भी सवालों के घेरे में आ गया है कि आखिर किन हांलात में यह अनुमति दी गई और क्या इसका दुरुपयोग किया गया?
हालांकि, प्रशासन की तरफ से अभी तक इस पर कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है. लेकिन विपक्ष और आम जनता दोनों ही इस मुद्दे पर जवाब मांग रहे हैं.
“अब तक नहीं आया कोई आधिकारिक बयान”
इतने बड़े घोटाले के बावजूद, महासमुंद पुलिस के उच्च अधिकारियों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. यह चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है. क्या मामले को दबाने की कोशिश हो रही है या फिर जांच अभी और गहराई तक जाएगी?
“क्या और भी हैं इस खेल के खिलाड़ी?”
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या यह सिर्फ तीन-चार लोगों का खेल है. या इसके पीछे एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है?
जिस तरह से महीनों तक यह अवैध रिफिलिंग का धंधा चलता रहा, उससे साफ है कि कहीं न कहीं सिस्टम की निगरानी भी फेल हुई है.
“जनता के हक पर डाका—कब मिलेगी पूरी सच्चाई?”
रसोई गैस, जो हर घर की जरुरत है. उसी को चोरी-छिपे बेचकर करोड़ों का खेल खेला गया. यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि आम जनता के भरोसे के साथ किया गया एक बड़ा धोखा है.
अब देखना यह होगा कि पुलिस जांच इस मामले में कितनी गहराई तक जाती है. और क्या सभी दोषियों को सजा मिल पाती है या नहीं.
महासमुंद का यह गैस घोटाला सिर्फ एक खबर नहीं. बल्कि एक चेतावनी है—कि जब जिम्मेदार लोग ही व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने लगें तो आम आदमी का भरोसा कैसे कायम रहेगा?
अब पूरे जिले की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस “सिलेंडर की साजिश” का पूरा सच सामने आएगा, या फिर यह भी बाकी घोटालों की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा.
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