इंसाफ का इंतजार करते-करते तहसील में चली गई जान, पेशी के दौरान कुर्सी पर बैठे-बैठे रिटायर्ड शिक्षक की हॉस्पिटल पहुंचने से पहले मौत
Life was lost in tehsil while waiting for justice, retired teacher died while sitting on chair during hearing before reaching hospital
सरगुजा : इंसाफ का इंतजार करते-करते तहसील में चली गई जान, छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले से एक बेहद दुखद और मार्मिक घटना सामने आई है. बतौली तहसील कार्यालय में अपने जमीन विवाद की पेशी का इंतजार कर रहे एक बुजुर्ग रिटायर्ड शिक्षक की कुर्सी पर बैठे-बैठे ही मौत हो गई. यह घटना सरकारी दफ्तरों में मामलों के लंबे खिंचने और उससे होने वाली आम आदमी की पीड़ा को उजागर करती है.
मिली जानकारी के मुताबिक गुरुवार को बतौली तहसील कार्यालय में लिंक कोर्ट चल रहा था. राजस्व प्रकरणों की सुनवाई के लिए अनुविभागीय अधिकारी (SDM) नीरज कौशिक मौजूद थे. बतौली के सरमना गांव के रहने वाले 70 साल की रिटायर्ड शिक्षक सहदेव पैंकरा भी अपने भूमि बंटवारे के मामले की सुनवाई के लिए सुबह 11 बजे से वहां मौजूद थे.
दोपहर करीब 1 बजे वे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. तभी अचानक कुर्सी पर बैठे-बैठे वे नीचे गिर पड़े. मौके पर मौजूद लोगों ने आनन-फानन में उन्हें उठाया और पास के सहदेव पैंकरा को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया. वहां मौजूद डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया. इस अचानक हुई घटना से तहसील कार्यालय में मौजूद हर कोई हैरान हो गया.
मृतक शिक्षक के नाती जय पैंकरा ने बेहद दुखी मन से बताया कि “मेरे दादाजी पिछले चार सालों से जमीन बंटवारे के इस केस के लिए लगातार पेशी पर आ रहे थे. आज भी वे सुबह से अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. उन्हें चक्कर आया और वे बेहोश होकर गिर गए. इंसाफ के लिए लड़ते-लड़ते ही उनका दुखद देहांत हो गया.” इस हादसे के बाद पूरा परिवार गहरे सदमे में है.
इस घटना पर एसडीएम नीरज कौशिक ने पुष्टि करते हुए कहा, “सहदेव पैकरा पारिवारिक विवाद के एक राजस्व प्रकरण में पेशी के लिए आए हुए थे. जब उन्हें हार्ट अटैक आया तो उन्हें अस्पताल ले जाया गया. लेकिन उनकी मौत हो गई.” उन्होंने परिवार के प्रति संवेदना जताई और कहा कि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि सालों तक चलने वाले कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं आम नागरिकों, खासकर बुजुर्गों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर कितना गहरा असर डालती हैं. सहदेव पैकरा जैसे कई लोग हैं जो अपने पारिवारिक मामलों की सुनवाई में लगातार तारीखें भुगतते रहते हैं और एक हल की उम्मीद में कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते रहते हैं.
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